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खादी और देशप्रेम.

Submitted by Uma Bhatkhande on October 1, 2018 – 10:11 am

खादी और देशप्रेम.

पहले जो ‘खद्दर,’ कहलाया
वही आजका खादी है
किसान जो उगाया कपास
उससे यह वस्त्र बनपायहै

चरकसे कतरे हुए यह
रेशमभी कहलाता है
हातका मेहनत इसका बनावट
सबको अन्नका मार्ग दिखलाता है

ब्रीटीश स्वर्थी मेहनतको ठेस पोहचते रहे
यंत्रोंसे बने कपडे अपने भारतको लेकर आतेरहे
भारतके आम जनता बेबसीसे बरबाद चलपडे
रोजी रोटिको तरसाते रास्तेपर आ खड़े

आया सूरजका एक नया किरण
वही हमारा गाँधी बापू है
उठाकर आवाज स्वदेशी आन्दोलनमे
प्रचार किया अपना खादी देशभरमे

साथ चली धीर गंगा बेना
ढून्ढ निकालतिरहि बुननेवाली स्त्रियोंको
जो काते धागा हातसे और
बनापाये सुन्दर कपडोंको

सबने दौड़ते जो हातबडाया
ग्रामकी जनता के मुँहपे फूल खिलाया
वही देशका अभिरुद्दी कहलाये
स्वावलम्बी जो सब बनपाये

गर्मीमे ठंडक देनेवाला
थंडीमे गरमी पोहॉंछनेवाला
सरल सज्जनताके भीतर देशप्रेम बढ़ानेवाला
गांधीका सपना पूरा करनेवाला
खादी हम्सब्का प्रेम है
खादी बढ़ाया देशप्रेम है .

                                    -उमा भातखण्डे .

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